90 टन गैस ‘हजम’, सिस्टम को बना दिया ठिकाना!

सुपुर्दगी की आड़ में करोड़ों की लूट; मालिक- डायरेक्टर-मैनेजर की मिलीभगत उजागर, 1.5 करोड़ का खेल बेनकाब
महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एलपीजी का एक बड़ा और चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षित रखने के लिए सुपुर्द किए गए करीब 90 मीट्रिक टन एलपीजी को योजनाबद्ध तरीके से अवैध रूप से बेच दिया गया। इस गबन की अनुमानित कीमत करीब 1.5 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
सुपुर्दगी के नाम पर खेला गया बड़ा खेल
पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार के अनुसार, 30 मार्च 2026 को सिंघोड़ा थाना क्षेत्र से 6 एलपीजी कैप्सूल ट्रक को अभनपुर स्थित ठाकुर पेट्रोकेमिकल प्लांट में सुरक्षित रखने के लिए भेजा गया था। लेकिन आरोपियों ने सुरक्षा के बजाय इसे कमाई का जरिया बना लिया।
6 दिनों में खाली कर दिए 6 कैप्सूल
जांच में खुलासा हुआ कि 31 मार्च से 6 अप्रैल के बीच सुनियोजित तरीके से सभी कैप्सूल खाली कर दिए गए। आरोपियों ने 31 मार्च को 2 कैप्सूल से गैस निकाले। इसी तरह
1 अप्रैल को 1 कैप्सूल से, 3 अप्रैल को 1 कैप्सूल से और 5 अप्रैल को 2 कैप्सूल से यानी हर कैप्सूल से औसतन 17 टन गैस निकाली गई।
जीपीएस ने खोली पोल, कर्मचारियों ने उगले राज
कैप्सूल में लगे जीपीएस सिस्टम से पूरी गतिविधि ट्रैक हुई। पूछताछ में प्लांट कर्मचारियों ने कबूल किया कि उन्होंने यह सब मालिक और मैनेजर के निर्देश पर किया था।
खरीद कम, बिक्री ज्यादा- बड़ा फर्जीवाड़ा
जांच में सामने आया कि अप्रैल महीने में कंपनी ने केवल 47 टन एलपीजी खरीदी, जबकि 107 टन की बिक्री दिखाई गई। यानी 60 टन गैस बिना खरीदे बेची गई, जो साफ तौर पर चोरी की गैस थी। कच्चे बिल और फर्जी रजिस्टर के जरिए इस अवैध कारोबार को छिपाया गया।
रायपुर की 8 एजेंसियां भी शक के घेरे में
इस घोटाले की आंच रायपुर तक पहुंची है। 8 गैस एजेंसियों पर चोरी की एलपीजी खरीदने का आरोप है। इनमें से 6 एजेंसियों ने 4 से 8 टन गैस कच्चे बिल पर खरीदी की है।
वजन नहीं कराया, बाद में बनाए फर्जी दस्तावेज
घोटाले को अंजाम देने के लिए एक बड़ी चाल चली गई। सुपुर्दगी के तुरंत बाद कैप्सूल का वजन नहीं कराया गया। 200 किमी के दायरे में धर्मकांटे होने के बावजूद अनदेखी की गई।
6 से 8 दिन बाद वजन कर फर्जी रिकॉर्ड तैयार किए गए।
सीसीटीवी से छेड़छाड़, दस्तावेज गायब
जांच में यह भी सामने आया कि सीसीटीवी
फुटेज से छेड़छाड़ की गई है। इसके अलावा
महत्वपूर्ण दस्तावेज और रजिस्टर गायब कर दिए गए। साथ ही आईटी सिस्टम में भी हेरफेर की कोशिश हुई है।
विशेषज्ञों ने खारिज किया ‘लीकेज’ का दावा
राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों की जांच में स्पष्ट हुआ कि कैप्सूल पूरी तरह सुरक्षित थे और इतनी बड़ी मात्रा में गैस का लीकेज होना असंभव है। इससे यह साफ हो गया कि गैस जानबूझकर निकाली गई।
एक गिरफ्तार, मास्टरमाइंड फरार
पुलिस ने इस मामले में अभनपुर निवासी निखिल वैष्णव (41) को गिरफ्तार किया है।
वहीं, मुख्य आरोपी संतोष सिंह ठाकुर (मालिक) समेत अन्य डायरेक्टर और मैनेजर फरार हैं, जिनकी तलाश जारी है। पुलिस ने इस मामले में 7 एलपीजी टैंकर, 4 बड़े बुलेट टैंक, 100 गैस सिलेंडर, कंप्यूटर, डीडीआर और दस्तावेज जब्त किए हैं। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 316(3), 61, 238, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 3 और 7,
साथ ही आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।
प्रशासनिक चूक या संगठित सिंडिकेट?
सरकारी सुपुर्दगी में रखी गई गैस का इस तरह गबन होना न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि एक बड़े एलपीजी ब्लैक मार्केटिंग सिंडिकेट की ओर भी इशारा करता है। जांच आगे बढ़ने पर और भी बड़े खुलासे होने की संभावना है। यह मामला केवल गबन नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों और मिलीभगत का गंभीर उदाहरण है, जहां सुरक्षा की जिम्मेदारी ही सबसे बड़ा खतरा बन गई।