दरबेकेरा डायवर्सन: 10 साल और 90 करोड़ स्वाहा, फिर भी प्यासे हैं सैंकड़ों किसानों के खेत

अफसरों और ठेकेदारों की ‘एटीएम’ बनी सिंचाई परियोजना, 18 किमी की नहर आज भी अधूरी
जयदेव सिंह
महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बागबाहरा ब्लॉक में सरकारी धन की बंदरबांट और प्रशासनिक लापरवाही की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के दावों की पोल खोल रही है। करीब 10 साल पहले शुरू हुई दरबेकेरा डायवर्सन परियोजना आज 90 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी केवल एक ‘शो-पीस’ बनकर रह गई है। आलम यह है कि करोंड़ों की इस योजना से आज तक किसानों को एक बूंद पानी नसीब नहीं हुआ है।
फाइलों में दौड़ा पानी, जमीन पर पसरा सूखा
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक साल 2016-17 में इस परियोजना को 35 करोड़ रुपए की प्रारंभिक लागत के साथ मंजूरी मिली थी। समय के साथ लागत बढ़ती गई और अब तक मुआवजा वितरण और नहर निर्माण के नाम पर लगभग 90 करोड़ रुपए व्यय किए जा चुके हैं। लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस है। 18 किलोमीटर लंबी प्रस्तावित नहर का काम आज 10 साल बाद भी अधूरा है। कई स्थानों पर पाइप डालने का काम कछुआ गति से चल रहा है, तो कहीं काम बंद पड़ा है।
मुआवजा मिला, पर उपज छिनी
परियोजना के लिए प्रभावित किसानों को लगभग 40.72 करोड़ रुपए का मुआवजा वितरण किया गया। लेकिन किसानों का कहना है कि मुआवजा देना सरकार की अंतिम जिम्मेदारी नहीं थी। किसान रामनाथ साहू ने बताया मुआवजे के नाम पर हमारे खेतों में काम रुकवा दिया गया, सर्वे के नाम पर सालों बीत गए, पर सिंचाई की सुविधा नहीं मिली। हम आज भी बारिश के भरोसे हैं।
भ्रष्टाचार का ‘गंभीर’ आरोप
किसान संगठनों ने इस पूरे प्रोजेक्ट को अफसरों और ठेकेदारों की कमाई का जरिया बताया है। किसान नेता ललित ठाकुर का आरोप है कि, यह परियोजना केवल कागजों पर चल रही है। तकनीकी रूप से यह प्रोजेक्ट फेल हो चुका है क्योंकि डायवर्सन में पानी का ठहराव केवल कुछ महीनों का है। बिना ठोस जांच के करोड़ों रुपए पानी में बहा दिए गए।
अधिकारी बोले- इस साल मिल जाएगा पानी
मामले में जल संसाधन विभाग (बागबाहरा) के एसडीओ एफ.के. बढ़ई का कहना है कि नहर का काम अंतिम चरण में है। 5 प्रमुख स्थानों पर लोहे की पाइप बिछाने का काम जारी है और इस वर्ष किसानों को पानी मिलने की पूरी संभावना है। हालांकि, ग्रामीण इस ‘आश्वासन’ को पुराना और खोखला मान रहे हैं।
निर्माण कार्य पर सवाल उठना लाजिमी
आखिर 10 साल की लंबी अवधि में भी 18 किमी की नहर पूरी क्यों नहीं हुई?
क्या तकनीकी खामियों और देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी?
क्या इस भारी-भरकम राशि के खर्च की लोकायुक्त या सीएजी से जांच कराई जाएगी?
जनहित की मांग
क्षेत्र के किसानों ने मांग की है कि इस पूरे प्रोजेक्ट की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए और जब तक नहर पूरी न हो, किसानों को सिंचाई के लिए वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराए जाएं।