एससी – एसटी की सूची के विस्तार को बताया सामाजिक न्याय की संवैधानिक प्रक्रिया
शासन से आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अनुभवजन्य आंकड़े जुटाने की मांग की
महासमुंद। एससी एवं एसटी की सूची में समय-समय पर हुए विस्तार को लेकर अधिवक्ता सुमीत सिंह ढिल्लों ने इसे सामाजिक न्याय और वास्तविक समानता के संवैधानिक सिद्धांत की अभिव्यक्ति बताया है। उन्होंने कहा कि यह धारणा भ्रामक है कि 1950 के बाद एससी एवं एसटी की सूची में किया गया विस्तार केवल राजनीतिक उद्देश्यों से हुआ है। उनके अनुसार सूची में बदलाव संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत सामाजिक वास्तविकताओं और वंचित समुदायों की पहचान से जुड़ा विषय है।
अधिवक्ता ढिल्लों के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 341(1) एवं 342(1) के तहत 1950-51 में जारी प्रारंभिक राष्ट्रपति आदेशों का दायरा तत्कालीन परिस्थितियों और उपलब्ध सामाजिक-प्रशासनिक आंकड़ों तक सीमित था। उस समय रियासती क्षेत्रों, विशेषकर भाग-ग राज्यों तथा जनजातीय बहुल क्षेत्रों में व्यवस्थित जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण एवं जनगणना संबंधी जानकारी का अभाव था।
उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए संसद को एससी एवं एसटी की सूचियों में संशोधन, समावेशन और अपवर्जन की संवैधानिक शक्ति प्रदान की। इसलिए 1950 के बाद सूची में हुआ विस्तार किसी नई जाति के मनमाने सृजन का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत समय के साथ सामाजिक वास्तविकताओं को समायोजित करने की प्रक्रिया है।
अधिवक्ता ने कहा कि भारतीय संविधान केवल औपचारिक समानता की अवधारणा तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक समानता को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। उनका तर्क है कि असमान परिस्थितियों में मौजूद लोगों के साथ समान व्यवहार करना अपने आप में असमानता को कायम रख सकता है। वास्तविक समानता का उद्देश्य ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को प्रभावी अवसर उपलब्ध कराकर उन्हें बराबरी की स्थिति में लाना है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरक्षण समानता के सिद्धांत का अपवाद नहीं, बल्कि वास्तविक समानता हासिल करने का एक माध्यम है।
अधिवक्ता ढिल्लों ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और पिछड़ेपन की पहचान से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों को स्पष्ट किया है।
उन्होंने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) के सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया। उनके अनुसार इस निर्णय में अनुसूचित जातियों के भीतर भी सामाजिक एवं वर्गीय असमानता की संभावना को स्वीकार करते हुए राज्य द्वारा अधिक वंचित वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण की संभावना को मान्यता दी गई है।
उनका कहना है कि यदि एससी एवं एसटी के भीतर वंचित समूहों की पहचान कर उनके लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था की जा सकती है, तो समय के साथ सूची में शामिल या बाहर किए गए समुदायों के सामाजिक पिछड़ेपन का वैज्ञानिक मूल्यांकन भी संवैधानिक समानता की भावना के अनुरूप होना चाहिए।
अधिवक्ता ने कहा कि केवल इस आधार पर कि एससी एवं एसटी की सूची में समय के साथ समुदायों की संख्या बढ़ी है, आरक्षण समाप्त करने का तर्क विधिक एवं तार्किक रूप से उचित नहीं है। उनके अनुसार सूची का विस्तार इस बात का संकेत हो सकता है कि सामाजिक पिछड़ेपन का दायरा पूर्व में किए गए आकलन से अधिक व्यापक था।
उन्होंने कहा कि आरक्षण की आवश्यकता का निर्धारण केवल सूची में शामिल समुदायों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन तथा प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति के आधार पर होना चाहिए।
अधिवक्ता ने राज्य शासन से आग्रह किया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप आरक्षण व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन एवं उप-वर्गीकरण के लिए आवश्यक अनुभवजन्य आंकड़ों का वैज्ञानिक संकलन कराया जाए।
उन्होंने कहा कि आंकड़ों के आधार पर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे कमजोर एवं वास्तविक रूप से वंचित वर्गों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। उन्होंने इसे संविधान में निहित सामाजिक न्याय एवं वास्तविक समानता के उद्देश्य की दिशा में आवश्यक कदम बताया।
