ग्रीष्मकालीन धान से दलहन एवं वैकल्पिक फसलों की ओर सफल परिवर्तन
बेमेतरा के प्रगतिशील किसान ने फसल विविधीकरण से बढ़ाया मुनाफा, जल संरक्षण को दिया बढ़ावा
बेमेतरा 01 जनवरी 2026/- जिले के ग्राम बिटकुली के प्रगतिशील कृषक दुकलहा साहू ने खेती में नवाचार और दूरदर्शी सोच अपनाकर ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर दलहन एवं अन्य वैकल्पिक फसलों की खेती कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी यह पहल न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध हुई है, बल्कि जल संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई है।
साहू ने पिछले वर्ष लगभग 25 एकड़ क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान की खेती की थी। धान उत्पादन संतोषजनक रहा, लेकिन अत्यधिक सिंचाई की आवश्यकता, बढ़ती उत्पादन लागत, बिजली और जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव जैसी कई व्यावहारिक चुनौतियों का उन्हें सामना करना पड़ा। इन अनुभवों ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए फसल प्रणाली में बदलाव आवश्यक है। इसी क्रम में इस वर्ष साहू ने साहसिक निर्णय लेते हुए ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर दलहन एवं अन्य वैकल्पिक फसलों को अपनाया। उन्होंने अपने खेतों में चना, गेहूँ एवं मटर की खेती की। इन फसलों का चयन उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया, क्योंकि इनमें कम पानी की आवश्यकता, कम लागत, कम अवधि में फसल तैयार होना तथा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की क्षमता जैसे कई लाभ हैं।
दलहन फसलों की खेती से खेतों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हुआ, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला। इसके साथ ही गेहूँ और मटर जैसी फसलों से बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप साहू की उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आई और शुद्ध लाभ में वृद्धि हुई। साथ ही, पानी की बचत होने से यह प्रयोग जल संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। दुकलहा साहू की यह सफलता अब आसपास के गांवों के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है। कई किसान उनके खेतों का भ्रमण कर फसल विविधीकरण की जानकारी ले रहे हैं और ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर वैकल्पिक फसलों को अपनाने के प्रति रुचि दिखा रहे हैं।
साहू का यह प्रयास यह स्पष्ट संदेश देता है कि स्थानीय परिस्थितियों, जल उपलब्धता और बाजार मांग को ध्यान में रखते हुए यदि किसान फसल विविधीकरण अपनाएं, तो खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है। बदलते समय में परंपरागत खेती के साथ वैज्ञानिक सोच और सही फसल चयन ही किसानों की आर्थिक समृद्धि और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की कुंजी है।
