गर्मी से पहले महानदी की रेत पर तरबूज-खरबूज की खेती शुरू

महासमुंद 19 फरवरी 2025। किसान हर साल की तरह महानदी में ग्रीष्मकाल के लिए रसीले फल तरबूज – खरबूज, ककड़ी और सब्जियों के लिए नदी की रेत पर खेती का काम शुरू हो गया है। किसानों ने खेती के लिए रेत पर क्यारियां तैयार कर बीजारोपण शुरू कर दिया है । जानकारी के अनुसार यहां हर वर्ष करीब 10 एकड़ में तीन-चार गांव के किसान तरबूज – खरबूज के साथ सब्जियों की फसल लेते हैं।
किसान जोगी निषाद, ऋषि जलक्षत्री ने बताया कि खेती की तैयारी वे जनवरी माह से शुरू कर देते हैं। जिसके लिए यहां वे क्यारियां तैयार करते हैं और बीजारोपण करते हैं। रेत में नमी होने से उन्हें पानी की आवश्यकता कम पड़ती है। करीब एक माह के अंदर पौधे तैयार होते हैं और उनमें फल आना शुरू हो जाता है, जिसकी बिक्री मार्च माह से शुरू हो जाती है। खेती को लेकर वे पिछले पखवाड़ेभर से यहां परिवार सहित जुटे हैं। बता दें कि महानदी में वर्षों से घोड़ारी, बरबसपुर, पारागांव सहित अन्य गांवों के करीब 40 किसान परिवार यहां खेती करते आ रहे हैं।
श्री निषाद व जलक्षत्री ने बताया कि यहां सड़क मार्ग पुल के दोनों ओर सभी किसान मिलकर खेती करते हैं। महानदी में सर्वाधिक तरबूज-तरबूज, खीरा-ककड़ी की फसल ली जाती है। इसके अलावा टमाटर, करेला, भिंडी, धनिया पत्ती सहित अन्य सब्जियों की फसल भी लगाते हैं। फसलों को पुल किनारे पसरा लगाकर बेचने के साथ ही रायपुर के थोक व्यापारियों को भी सप्लाई करते हैं। श्री निषाद का कहना है कि महानदी पर खेती से उनकी चार माह आमदनी होती है। यहां की खरबूज-तरबूज की मांग छग के अलावा महाराष्ट्र, दिल्ली के अलावा विदेशों तक है। रायपुर के बड़े व्यापारियों द्वारा थोक में फसल खरीदकर विदेशों में निर्यात किया जाता है। सर्वाधिक मांग तरबूज की रहती है। गर्मी में इस रसीले फल की सबसे अधिक मांग रहती है। महानदी के अलावा इसकी खेती बसना क्षेत्र से होकर गुजरी जोंक नदी पर भी होती है। ओड़िशा प्रांत में भी इसकी खेती वर्षों से हो रही है। पिछले कई वर्षों से खेती कर रहे जोगी निषाद ने बताया कि चार माह यहां खेती होती है। जिसमें प्रत्येक किसानों को 40-50 हजार रुपये की आमदनी होती है। उत्पादक इसे राष्ट्रीय राजमार्ग 53 में महानदी पुल पर अस्थाई दुकान लगाकर बेचते हैं जिसे राहगीर खरीदते हैं। राहगीरों को यहां तरबूज, खरबूज के अलावा ताजी सब्जियां, भाजी भी मिल जाती है।