नीट प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश पर उठे सवाल, एडवोकेट ने हिरासत में पूछताछ की वकालत की

हिंसक प्रदर्शन के आरोपियों की बिना पूछताछ रिहाई जांच को करेगी प्रभावित
महासमुंद। नीट पेपर लीक मामले को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार 18 वर्ष से कम आयु एवं बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों की रिहाई संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पर महासमुंद के अधिवक्ता सुमीत सिंह ढिल्लो ने चिंता जताई है। उन्होंने न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए कहा कि हिंसक घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए इस मामले में पुनर्विचार की आवश्यकता है।
ढिल्लो ने जारी बयान में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने जहां एक ओर नाबालिग प्रदर्शनकारियों की रिहाई के निर्देश दिए हैं, वहीं नीट प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन, बॉडीकैम और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का आदेश भी दिया है। उन्होंने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि निष्पक्ष जांच के लिए डिजिटल साक्ष्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, बैरिकेड तोड़े गए और पुलिस पर हमले हुए। स्वयं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी न्यायालय के समक्ष यह कहा कि घटनाओं में कुछ असामाजिक तत्व शामिल थे। ऐसे में सीधे रिहाई के बजाय सीमित अवधि के लिए हिरासत में पूछताछ की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि हिंसा की साजिश, फंडिंग और इसमें शामिल लोगों की भूमिका का खुलासा हो सके।
अधिवक्ता ढिल्लो का कहना है कि यदि हिरासत की अनुमति संभव न हो, तो कम से कम किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) की प्रक्रिया पूरी किए बिना सीधे रिहाई नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि नाबालिगों को पुलिस हिरासत से मुक्त कर 24 घंटे के भीतर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया जाए और अभिभावकों के आने तक ऑब्जर्वेशन होम में रखा जाए। इससे न्यायिक निगरानी, साक्ष्यों की सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित हो सकेगी।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा “बल प्रयोग न करने” और “आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को संरक्षण से बाहर रखने” की बात सराहनीय है, लेकिन किशोर न्याय बोर्ड की प्रक्रिया को दरकिनार करना बाल कल्याण के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
ढिल्लो ने स्पष्ट किया कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार के पक्षधर हैं, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और पुलिस पर हमले का किसी भी स्थिति में समर्थन नहीं किया जा सकता। उनका सुझाव है कि जिन मामलों में पुलिस पर हमले के प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं, वहां सीमित हिरासत में पूछताछ की अनुमति दी जाए, जबकि अन्य नाबालिगों को किशोर न्याय बोर्ड की विधिक प्रक्रिया के माध्यम से राहत प्रदान की जाए।
उन्होंने केंद्र सरकार से भी आग्रह किया कि कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले तत्वों के विरुद्ध दर्ज मामलों को वापस लेने पर विचार न किया जाए। उनका कहना है कि कानून का उल्लंघन करने वालों को संरक्षण मिलने से गलत संदेश जाएगा और भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को बढ़ावा मिल सकता है।
बयान के अंत में अधिवक्ता सुमीत सिंह ढिल्लो ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीसीटीवी, ड्रोन, बॉडीकैम और वायरलेस रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पूरे मामले की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

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