किसानों को हरी खाद बनाने की सलाह

बालोद, 10 अप्रैल 2026/रासायनिक उर्वरकों का बेहतर विकल्प है हरी खाद, इससे जमीन में नमी, आर्गेनिक कार्बन, नाईट्रोजन और सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि होता है। रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से न सिर्फ लोगों की सेहत खराब हो रही है, बल्कि इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर भी बुरा असर पड़ रहा है। किसानों के सामने यह सबसे गंभीर समस्या है, इसलिए रासायनिक खादों के विकल्प की ओर जाना समय की मांग है। ऐसा करके खेती की लागत को कम कर फसलों की प्रति एकड़ उपज को बढ़ाया जा सकता है। हरी खाद खेत को नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, जस्ता तांबा, मैगनीज और लोहा आदि तत्य मुहैया कराती है। रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में जैविक खाद जैसे गोबर, कम्पोस्ट, हरी वाद आदि का उपयोग किया जा सकता है, इनमें हरी खाद सबसे सरल व अच्छा साधन है। पशुधन में आई कमी के कारण गोबर की उपलब्धता पर भी निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। हरी खाद का अर्थ उन पत्तीदार फसलों से है, जिनकी वृद्धि तेजी से होती है, ऐसी फसलों को फल आने से पहले जोत कर मिट्टी में दबा दिया जाता है।
कृषि में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते है जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदाथों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। प्रायः इस तरह की फसल को कोमल स्थिति में ही हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और भूमि की रक्षा होती है। मृदा के लगातार दोहन से उसमें उपस्थित पौधे की बढ़वार के लिये आवश्यक तत्त्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु व मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने के लिये हरी खाद एक उत्तम विकल्प है। बिना गले-सड़े हरे पौधे (दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं। हरी खाद के उपयोग से न सिर्फ नत्रजन भूमि में उपलब्ध होता है बल्कि मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में भी सुधार होता है। वातावरण तथा भूमि प्रदूषण की समस्या को समाप्त किया जा सकता है। लागत घटने से किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। भूमि में सूक्ष्म तत्वों की आपूर्ति होती है, साथ ही मृदा की उर्वरा शक्ति भी बेहतर हो जाती है।
हरी खाद केवल नत्रजन व कार्बनिक पदार्थों का ही साधन नहीं है बल्कि इससे मिट्टी में कई अन्य आवश्यक पोषक तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। हरी खाद के प्रयोग में मृदा भुरभुरी, वायु संचार में अच्छी, जलधारण क्षमता में वृद्धि, अम्लीयता/क्षारीयता में सुधार एवं मृदा क्षरण में भी कमी होती है। हरी खाद के प्रयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है। हरी खाद में मृदाजनित रोगों में भी कमी आती है। इसके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों में कमी करके भी टिकाऊ खेती कर सकते हैं। लगभग 30 से 40 दिन बाद हरी खाद के लिए बोई गई फसल को मिट्टी में मिला दिया जाता है। खेत में मिलने के बाद 10 से 15 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव करने से पौधों का विघटन जल्दी हो जाता है। खेत में मिलने पर सूक्ष्म जीव इसे विघटित कर देते हैं, यह खाद के रूप में फसल को उपलब्ध हो जाती है। फसल को बोने से पहले हरी खाद की फसल को मिट्टी में मिलाया जाता है। हरी खाद को अधिक गहरा नहीं मिलाना चाहिए क्योंकि यह पोषक तत्वों को बहुत गहराई तक दबा देता है। फसल को एक विशेष अवस्था पर खेत में पलटने से ही अधिकतम नाईट्रोजन का लाभ मिल पाता है।
बालोद जिले में कृषकों को हरी खाद तैयार करने के लिए दलहनी फसलों में सनई (सनहेम्प), कैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ग्वार आदि फसलों का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। इन फसलों की वृद्धि शीघ्र कम समय में हो जाती है, पत्तियों बड़ी वजनदार एवं बहुत संख्या में रहती है एवं इनकी उर्वरक तथा जल की आवश्यकता कम होती है, जिससे कम लागत में अधिक कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो जाता है। दलहनी फसलों में जड़ों में नाइट्रोजन को वातावरण से मृदा में स्थिर करने वाले जीवाणु पाए जाते
अधिक वर्षा वाले स्थानों में जहाँ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सनई का उपयोग, ढैंचा को सूखे की दशा वाले स्थानों में तथा समस्याग्रस्त भूमि में जैसे क्षारीय दशा में उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। ग्वार को कम वर्षा वाले स्थानों में रेतीली, कम उपजाऊ भूमि में लगाने एवं लोबिया को अच्छे जल निकास वाली क्षारीय मृदा में तथा मूंग, उड़द को खरीफ या ग्रीष्म काल में ऐसे भूमि में ले. जहाँ जल भराव न हो की सलाह दी जा रही है। इससे इनकी फलियों की अच्छी उपज प्राप्त हो जाती है तथा शेष पौधा हरी खाद के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। मुख्य हरी खाद फसलों में 40 से 50 किलोग्राम/हेक्टेयर नाट्रोजन स्थिरीकरण तथा 10 किलोग्राम/हेक्टेयर फास्फोरस स्थिरीकरण एवं 20 किलोग्राम/हेक्टेयर पोटास का स्थिरीकरण करती है। हरी खाद तैयार किये जाने हेतु इच्छुक किसान जिले के संबधित विकासखण्डों के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।