धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास विपरीत परिस्थितियों को भी बदल देता है: राजीव लोचन
महासमुंद। ‘अत्याचारी चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका विनाश निश्चित है। जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पाप का अंत करते हैं।’ यह ओजस्वी उद्बोधन दक्षिण कौशल पीठाधीश्वर स्वामी राजीव लोचन महाराज ने गुलाबबाड़ा, बेमचा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिया।
कथा के पाँचवें दिन श्रीकृष्ण जन्म और श्रीराम जन्म प्रसंग का मार्मिक वर्णन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि कारागार में कंस के अत्याचार सहते हुए भी वासुदेव और देवकी ने धैर्य और अटूट आस्था का परिचय दिया। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनके पुत्र के रूप में स्वयं भगवान अवतरित होकर कंस के अत्याचारों का अंत करेंगे। यह प्रसंग मानव जीवन के लिए प्रेरणा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास बनाए रखना चाहिए। स्वामी राजीव लोचन महाराज ने आगे कहा कि राजा दशरथ और वासुदेव के जन्म-जन्मांतर के पुण्य कर्मों का ही प्रतिफल था कि स्वयं जगतपालक प्रभु ने उनके यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया। भगवान को केवल निष्कलुष भाव चाहिए-चाहे प्रेम से स्मरण करो या विरोध से, उनका नाम अंतत: कल्याण ही करता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रावण और कंस दोनों ही दिन-रात भगवान का चिंतन करते थे। यद्यपि वे शत्रुता भाव रखते थे, फिर भी भय और व्याकुलता में उनके हृदय में हर क्षण भगवान का ही वास था। अंतत: प्रभु ने श्रीकृष्ण और श्रीराम के रूप में अवतरित होकर उनका उद्धार किया और उन्हें मोक्ष का मार्ग प्रदान किया। महाराज श्री ने कहा कि जो परमधाम का सौभाग्य बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को कठिन तपस्या के बाद भी दुर्लभ रहता है, वही रावण और कंस को प्रभु की कृपा से प्राप्त हुआ। कथा स्थल पर भक्ति की अविरल धारा बहती रही। भक्तिमय भजनों की गूंज से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठा और श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूमते नजर आए।
