जहां कभी था डर का सन्नाटा, अब दौड़ रही उम्मीद की बस
पुवर्ती से सुकमा तक बदली तस्वीर, दुर्गम बीहड़ों में उम्मीद का हॉर्न
सुकमा के अंदरूनी इलाकों में जीवनरेखा बनी “मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा“
सुकमा, 04 अक्टुबर 2026/जिन रास्तों पर कभी खामोशी और डर का पहरा रहता था, आज वहां गूंजता बस का हॉर्न ग्रामीणों के चेहरे पर उम्मीद की मुस्कान ले आता है। सुकमा के धुर नक्सल प्रभावित रहे पुवर्ती, सिलगेर, ताड़मेटला और भेज्जी जैसे गांवों के लिए पक्की सड़क पर दौड़ती बस सिर्फ लोहे की गाड़ी नहीं, बल्कि मुख्यधारा से जुड़ने का पुल बन चुकी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल “मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना“ और “नियद नेल्लानार“ अभियान ने उन बीहड़ों का भूगोल बदल दिया है, जहां पहले मीलों पैदल चलना ही नियति थी।
मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा का सबसे भावुक और मानवीय पहलू उन कंधों पर दिखता है, जो अब बोझ से नहीं, बस्ते से सजे हैं। अंदरूनी गांवों की बेटियां और युवा, जो उच्च शिक्षा के अभाव में घरों में सिमट जाते थे, अब सुबह समय पर बस पकड़कर शहरों के कॉलेजों और स्कूलों में पहुंच रहे हैं। सुकमा से बड़ेसट्टी, जगरगुंडा से कोंटा और चिंतलनार से सुकमा जैसे 9 संवेदनशील रूटों पर नियमित चलने वाली इन बसों ने बस्तर के नौनिहालों के सपनों को एक नई और सुरक्षित रफ्तार दी है।
गोलाबेकुर की कॉलेज छात्रा राखी यादव ने बताया कि मुख्यमंत्री बस सेवा शुरू होने से उन्हें कॉलेज आने-जाने में काफी सुविधा मिल रही है। पहले निजी वाहन से सुकमा तक सफर करना मुश्किल और महंगा पड़ता था, लेकिन अब बस सेवा से रोजाना आसानी से कॉलेज पहुंच रही हैं। उन्होंने कहा कि बस सुबह 7-8 बजे के आसपास मिल जाती है, जिससे समय की बचत के साथ किराए में भी राहत मिल रही है। कोंटा ब्लॉक के मिसमा निवासी सोमेश्वरी ठाकुर बताती हैं कि मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना के माध्यम से सुकमा के सुदूर और पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, जैसे सिलगेर, जगरगुंडा और चिंतलनार तक आवागमन सुगम हो गया है। इस सुविधा से ग्रामीणों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बैंकिंग सेवाओं तक बेहतर पहुँच मिल रही है, जिससे क्षेत्र में विकास की नई राह खुली है और लोग मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
परिवहन की इस सुविधा ने सुदूर जंगलों में स्वास्थ्य और आजीविका की तस्वीर भी बदली है। हाट-बाजारों तक अपनी उपज ले जाने के लिए अब किसानों को भारी भरकम किराया या असुरक्षित साधन नहीं ढूंढने पड़ते। सबसे बड़ा सुकून उन बुजुर्गों और माताओं को मिला है, जिन्हें आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचने के लिए खाट या कंधों का सहारा लेना पड़ता था। अब सुरक्षित और सुलभ बस सेवा के चलते जरूरी चिकित्सा सेवाएं कुछ घंटों की दूरी पर सिमट आई हैं।
