एलपीजी गबन कांड में बड़ा खुलासा: कोल्हापुर से दबोचे गए ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के मालिक-पुत्र, अब आमने-सामने बैठाकर होगी पूछताछ

करोड़ों के एलपीजी घोटाले में पुलिस की बड़ी कार्रवाई, मास्टरमाइंड से लेकर राजनीतिक कनेक्शन तक खुल रहे राज
महासमुंद। जिले में करोड़ों रुपये के बहुचर्चित एलपीजी गबन कांड में पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है। लंबे समय से फरार चल रहे ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के मालिक संतोष सिंह ठाकुर और उनके पुत्र व कंपनी के डायरेक्टर सार्थक सिंह ठाकुर को पुलिस ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर से गिरफ्तार कर लिया है। दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर महासमुंद लाया गया है, जहां अब पुलिस उनसे गहन पूछताछ कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक पूछताछ के दौरान दोनों आरोपियों ने कई अहम राज उगले हैं। इसके बाद पुलिस अब इस पूरे मामले के कथित मास्टरमाइंड सस्पेंडेड जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव, भाजपा नेता पंकज चंद्राकर, पेट्रोकेमिकल्स के मैनेजर निखिल वैष्णव, व्यापारी मनीष चौधरी समेत सभी आरोपियों को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ की तैयारी कर रही है। माना जा रहा है कि इस पूछताछ के बाद पूरे नेटवर्क और पैसों के लेन-देन से जुड़े कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।
पुलिस जांच में बड़ा दावा: खाद्य अधिकारी ने रची पूरी साजिश, भाजपा नेता ने निभाई अहम भूमिका
पुलिस कप्तान प्रभात कुमार एएसपी प्रतिभा पाण्डेय ने संयुक्त रूप से बताया कि जांच में सामने आया है कि इस पूरे एलपीजी गबन कांड की पटकथा तत्कालीन जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव ने तैयार की थी। जांच एजेंसियों का दावा है कि अजय यादव पर्दे के पीछे रहकर पूरे खेल को संचालित कर रहा था, जबकि भाजपा नेता पंकज चंद्राकर ने सौदेबाजी और नेटवर्किंग में मुख्य भूमिका निभाई। वहीं व्यापारी मनीष चौधरी ने कथित रूप से मध्यस्थ की भूमिका निभाई और विभिन्न पक्षों के बीच सौदे को अंतिम रूप दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाई। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क के वित्तीय लेन-देन और अन्य विभागीय अधिकारियों की संलिप्तता की भी जांच कर रही है।
1.30 करोड़ से शुरू हुआ सौदा, 90 लाख में हुई डील
पुलिस के अनुसार छह गैस कैप्सूलों में भरी एलपीजी गैस को बेचने के लिए शुरुआत में करीब 1 करोड़ 30 लाख का रेट तय की गई थी। खाद्य अधिकारी अजय यादव के कहने पर भाजपा नेता पंकज चंद्राकर ने कई व्यापारियों से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने इस सौदे से दूरी बना ली।
इसके बाद भाजपा नेता पंकज चंद्राकर ने व्यापारी मनीष चौधरी से संपर्क साधा। दोनों ने मिलकर ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के मालिक संतोष सिंह ठाकुर और डायरेक्टर सार्थक सिंह ठाकुर से बातचीत शुरू की। लगभग एक सप्ताह तक चले मोलभाव के बाद सौदा करीब 90 लाख रुपये में तय हुआ।
पुलिस के अनुसार इस रकम के बंटवारे का भी पूरा खाका तैयार था। बताया जा रहा है कि इसमें लगभग 50 लाख रुपये अजय यादव, 20 लाख रुपये भाजपा नेता पंकज चंद्राकर और 20 लाख रुपये मनीष चौधरी को मिलने थे। हालांकि मनीष चौधरी अब तक खुद को केवल 10 लाख रुपये मिलने की बात बता रहा था। जांच में यह भी सामने आया है कि पैसों का लेन-देन ग्राम परसवानी स्थित भाजपा नेता पंकज चंद्राकर के कारखाने “आस्था ट्राली” में होता था। सूत्रों का दावा है कि खाद्य विभाग के कुछ अधिकारी भी पंकज चंद्राकर के साथ एक ही वाहन में सिंघोड़ा थाना जाया करते थे।
फरारी के दौरान बदलते रहे शहर, मोबाइल और सिम
पुलिस के अनुसार फरार आरोपी संतोष सिंह ठाकुर और सार्थक सिंह ठाकुर पिछले एक महीने से लगातार अपने ठिकाने बदल रहे थे। दोनों अलग-अलग राज्यों और शहरों में छिपकर रह रहे थे तथा पुलिस से बचने के लिए बार-बार मोबाइल नंबर और सिम कार्ड बदल रहे थे। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने 11 शहरों के मोबाइल टॉवर डंप, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), टोल प्लाजा डेटा, बैंकिंग और फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन तथा सोशल मीडिया गतिविधियों की गहन जांच की। इसके बाद मिले तकनीकी सुरागों के आधार पर चार अलग-अलग टीमों को विभिन्न राज्यों में रवाना किया गया।
लगातार निगरानी और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आखिरकार दोनों आरोपियों को महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित एक होटल से गिरफ्तार कर लिया गया।
ऐसे सामने आया था पूरा खेल
यह पूरा मामला उस समय सामने आया जब सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में एलपीजी गैस से भरे छह कैप्सूल ट्रकों से गैस चोरी करते हुए सरायपाली एसडीएम ने आरोपियों को रंगे हाथों पकड़ लिया था। सुरक्षा कारणों से गैस से भरे कैप्सूलों को सिंघोड़ा थाना परिसर में खड़ा कराया गया था।
बाद में पुलिस प्रशासन ने इन टैंकरों को सुरक्षित रखने के लिए कलेक्टर को सुपुर्दनामा भेजा। कलेक्टर ने इसकी जिम्मेदारी खाद्य विभाग को सौंपी। जांच एजेंसियों का दावा है कि यहीं से तत्कालीन जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव ने पूरी साजिश रची और गैस कैप्सूलों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स को सौंप दी गई।
सुपुर्दनामा के बाद खाली करा दी गई गैस, फिर बना फर्जी पंचनामा
पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि सुपुर्दनामा मिलने के बाद गैस कैप्सूलों से एलपीजी निकालकर उसे बेच दिया गया। जांच एजेंसियों के मुताबिक करीब 87 टन एलपीजी गैस की हेराफेरी की गई, जिसकी कीमत लगभग 77 लाख रुपये आंकी गई है।
बताया जा रहा है कि कई टैंकरों से गैस निकालकर अलग-अलग एजेंसियों और संस्थानों को बिना जीएसटी और कच्चे बिलों पर बेचा गया। जांच में यह भी सामने आया कि अप्रैल महीने में जहां लगभग 40 टन एलपीजी खरीदी गई थी, वहीं करीब 135 टन एलपीजी बेचने का रिकॉर्ड मिला है, जिससे बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की पुष्टि हुई है।
जांच एजेंसियों ने यह भी पाया कि पूरे मामले को वैध दिखाने के लिए फर्जी पंचनामा तैयार किया गया। कथित तौर पर ये दस्तावेज खाद्य विभाग कार्यालय में तैयार किए गए और पंचनामा में उन्हीं लोगों को गवाह बनाया गया, जो इस साजिश के मुख्य किरदार बताए जा रहे हैं।
कई गंभीर धाराओं में दर्ज है मामला
पुलिस ने इस पूरे मामले में आपराधिक न्यास भंग, आपराधिक षड्यंत्र, कूटरचना, कालाबाजारी, शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग समेत कई गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया है।
इससे पहले पुलिस जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव, भाजपा नेता पंकज चंद्राकर, व्यापारी मनीष चौधरी और पेट्रोकेमिकल्स के मैनेजर निखिल वैष्णव को गिरफ्तार कर चुकी है। अब मुख्य आरोपी पिता-पुत्र की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को और भी बड़े खुलासों की उम्मीद है।
पुलिस का दावा: अभी और बढ़ सकती है आरोपियों की संख्या
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ में कई अहम जानकारियां सामने आई हैं और खाद्य विभाग के कुछ अन्य अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। सूत्रों की मानें तो जांच अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और आने वाले दिनों में इस मामले में कुछ और बड़ी गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
जिले में इस एलपीजी गबन कांड ने प्रशासनिक तंत्र, खाद्य विभाग और राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मचा दी है। अब सबकी नजर पुलिस की अगली कार्रवाई और पूछताछ से सामने आने वाले नए खुलासों पर टिकी हुई है।

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