दुखों से बचना है तो वाणी पर संयम रखें, वाणी से बनते हैं कर्म: अमोही साहेब

कबीर मंदिर में हुआ दो दिवसीय वार्षिक सत्संग का आयोजन
महासमुंद। समस्या केवल व्यवहारिक जीवन में है अलौकिक जीवन में कोई समस्या नहीं होती। सोच, समझ, विचार एक जैसे लगते हैं, लेकिन तीनों अलग-अलग है ज्यादा सोचने से व्यक्ति दुखी होता है, जब समझ आ जाएगी तो लोग जाग्रत हो जाएंगे। इसी तरह विचार है, जो लोगों को मार्ग दिखाता है। दुखों से बचना है तो वाणी पर संयम रखिए, वाणी से कर्म बनते और बिगड़ते हैं। उक्त विचार रायपुर मार्ग स्थित कबीर मंदिर में चल रहे दो दिवसीय वार्षिक सत्संग के अवसर पर मध्यप्रदेश बुरहानपुर से पधारे संत अमोही साहेब ने उपस्थित सत्संग प्रेमियों से कही।
उन्होंने कहा कि वाणी से मनुष्य दुखी और सुखी हो सकता है, यदि तुम्हारी वाणी सही है और संयमित है तो व्यवहार अच्छा होगा। कभी-कभी शब्दों का अर्थ जाने बिना भी हम उसे बोल जाते हैं यह भी गलत है। लेकिन जब हम अर्थ समझ जाते हैं तो उसके प्रभाव की समझ पैदा होती है। एक मां जब अपने बच्चे को गाली देती है तो वह गाली का अर्थ नहीं जानती। यदि गाली का अर्थ जिस दिन मां समझ जाएगी और गाली के अनुरूप उसका बच्चा होगा तो क्या वह मां उसे बर्दाश्त करेगी? इसलिए शब्दों को समझना भी चाहिए। उन्होंने कहा कि संतों के सत्संग से मनुष्य में समझने की शक्ति पैदा होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सत्संग अवश्य करना चाहिए। अमोही साहेब ने बताया कि मानव जीवन दुर्लभ है और सौभाग्य से मिलता है, अच्छा समाज, परिवार और संस्कार मिलना सौभाग्य की बात है। यह सब अच्छे कर्मों का फल है, इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिए। उन्होंने बताया कि आदमी के पास मानसिक चिंतन ज्यादा है, इसलिए वह ज्यादा दुखी होता है। कबीर आश्रम ढेठा धमतरी से पधारे संत बलवान साहेब ने कहा कि इच्छा और आवश्यकता दोनों में अंतर है। आवश्यकता की पूर्ति तो हो सकती है, लेकिन इच्छा ऐसा व्यसन है जिसे कोई गुरु हरा नहीं सकता। एक पुरी हुई तो दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है। उन्होंने कहा कि भोग की चाहत से मनुष्य रोग में फंसता है। कबीर साहेब ने मनुष्य को पारख सिद्धांत बताया पहले जानो फिर मानो, यही कबीर का पारख सिद्धांत है। सद्गुणों को धारण करने से सुख की प्राप्ति होती है। प्रत्येक मनुष्य को सुख प्राप्त करना है तो उसे विवेकी और विचारवान बनना होगा। कोई भी गुरु वासना और तृष्णा मुक्त नहीं कर सकता। दोनों से मुक्त तुम स्वयं हो सकते हो, इसके लिए तुम्हें स्वयं ही प्रयास करना होगा। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को सुंदर तरीके से जीने की कला आनी चाहिए, अपने दुख और सुख का कारण मनुष्य स्वयं है। भुनेश्वर साहेब ने सुंदर भजन प्रस्तुत किया। सत्संग उपरांत कबीर साहेब की आरती हुई और महाप्रसादी का वितरण किया गया।