मत्स्य पालन से आई आर्थिक समृद्धि, किसान जयराम की बदली जिंदगी
दंतेवाड़ा, 09 जनवरी 2025। प्रगतिशील कृषकों के लिए मत्स्य पालन सदैव से ही लाभ अर्जित करने का पसंदीदा क्षेत्र रहा है। मत्स्य पालन के लिए आदर्श परिस्थितियों में जल स्त्रोत के समीप की भूमि को उपयुक्त माना जाता है जहां तालाब का निर्माण किया जा सकता है। इसके अलावा भूमि ऐसी होनी चाहिए जिसमें वर्षा का जल एकत्रित हो सकें। साथ ही विद्युत कनेक्षन और ट्यूबबेल की सुविधा भी मत्स्य पालन के लिए आवश्यक तत्व में से एक है। ऐसे कृषक जिनके पास छोटे बड़े नदी नालों के समीप खेतिहर भूमि है ऐसी स्थिति में मत्स्य पालन कृषियेत्तर आमदनी का आकर्षक विकल्प प्रस्तुत करता है। विकासखंड कुआकोंडा के ग्राम मैलावाड़ा के कृषक जयराम कश्यप भी 2017 से पूर्व अपनी 3-4 एकड़ की पुश्तैनी भूमि में आम कृषक ही थे। उनकी यह भूमि गांव के बहने वाले सदानीरा नाले के समीप ही थी। वर्ष 2017 में स्वप्रेरणा एवं मत्स्य विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी निजी भूमि के 0.50 हैक्टेयर में तालाब का निर्माण करवाया। इसके पश्चात उनका कुशल मत्स्य पालक के सफर की शुरुआत हुई। सघन मत्स्य पालन से हुई अतिरिक्त आमदनी ने उन्हें आत्मविश्वास देते हुए मछली पालन से संबंधित उन्नत तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित किया। फलस्वरूप 2023-24 में उन्होंने विभागीय सहयोग से 0.10 हेक्टेयर में पौंड-लाइनर (मत्स्य बीज रखने का हौज) का निर्माण (लागत 2.50 लाख रूपये) कराया। पौंड-लाइनर का आकार एक छोटे तालाब के समान होता है। जहां तली में पॉलिथीन की सतह बिछाई जाती है एवं ऑक्सीजन पूर्ति हेतु सिस्टम लगाया जाता है। ताकि मत्स्य बीजों की बढ़त के लिए निरंतर ऑक्सीजन की आपूर्ति होती रहे। मत्स्य पालन विभाग द्वारा इसके लिए अनुसूचित जनजाति वर्गों एवं महिलाओं को 60 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। कृषक जयराम को इसके अलावा विभाग की अन्य हितग्राही मूलक योजनाओं जैसे मत्स्य आखेट उपकरण, आईस बाक्स, मछलियों हेतु परिपूरक आहार, मत्स्य बीज उपलब्ध कराने जैसे लाभ दिए गए। जयराम कश्यप के इन प्रयासों ने उन्हें आज सफल मत्स्य पालक बना दिया है वे बताते है मत्स्य पालन व्यवसाय से उन्हें कुल साढ़े पांच लाख रुपये की सालाना आमदनी हो रही है। जबकि 2017 के पूर्व कृषि से होने वाली आय से कई गुना अधिक है। उनके दोनों पुत्र भी इस कार्य में उनकी मदद करते है। उनके पुत्र लोकेन्द्र ने बताया कि पौंड-लाइनर में छोटी मछलियों के नस्ल जैसे सारंगी (फंगाल) का पालन किया जा रहा है जबकि तालाब में रोहू, कतला, मृगल, कॉमन कॉर्प जैसी मछलियां पाली जा रही है। मछलियों के विपणन के संबंध में उन्होंने बताया कि स्थानीय बाजारों में ही मछलियों की खपत हो जाती है। और कभी-कभी तो मांग इतनी बढ़ जाती है कि पूर्ति करना कठिन हो जाता है। भविष्य की योजना के संबंध में लोकेन्द्र का कहना था कि वे अपने तालाब के समीप ही कुक्कुट शेड बनाना चाहते है। कुल मिलाकर मत्स्य पालन व्यवसाय ने श्री जयराम कश्यप एवं उनके परिवार को एक निश्चित आय का जरिया दिया है। और वह उनके जैसे अन्य कृषकों के लिए एक प्रेरणा का कार्य कर रहे है।
