फ्रेंडशिप बैंड से कहीं आगे है छत्तीसगढ़ की ‘मितान’ परंपरा
एक फूल, गंगाजल या दौना-पान से जुड़ते हैं दो परिवार, सात पीढ़ियों तक निभता है अटूट रिश्ता
अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस पर जानिए समरसता की अनोखी मिसाल
महासमुंद। आधुनिक दौर में जहां दोस्ती अक्सर सोशल मीडिया, सेल्फी और फ्रेंडशिप बैंड तक सिमटती जा रही है, वहीं छत्तीसगढ़ की धरती पर आज भी मित्रता का ऐसा अनुपम संस्कार जीवित है, जो केवल दो व्यक्तियों को ही नहीं, बल्कि दो परिवारों और आने वाली सात पीढ़ियों को भी आत्मीय रिश्ते में जोड़ देता है। इसे यहां ‘मितान बदना’ कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस के अवसर पर यह परंपरा भारतीय लोकसंस्कृति, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत करती है।
छत्तीसगढ़ की लोककथा और जनजीवन में मितान केवल मित्र नहीं, बल्कि धर्म-भाई का दर्जा रखता है। यहां प्रचलित कहावत “माटी के देह हा माटी में मिल जाही, पर मितान के दिए बचन कभू न जाही” इस रिश्ते की पवित्रता और अटूट विश्वास को दर्शाती है।
मितान बनने के बाद दोनों एक-दूसरे का नाम नहीं लेते, बल्कि “सीताराम मितान” या “जय जोहार मितान” कहकर सम्मानपूर्वक अभिवादन करते हैं। इस रिश्ते की विशेषता यह है कि यह केवल जीवनभर नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाया जाता है। दादा के समय बना गंगाजल मितान का संबंध आज भी पोते और परपोते पूरी श्रद्धा से निभाते हैं।
दस पावन प्रतीकों से बनता है मितान
छत्तीसगढ़ में बिना किसी खर्च और आडंबर के दस पवित्र प्रतीकों के माध्यम से मितान बनाया जाता है। इनमें जंवारा, गंगाजल, गंगा बारु, गोवर्धन, भोजली, महाप्रसाद, गेंदा फूल, धंवई फूल, तुलसी दल तथा दौना-पान प्रमुख हैं। इन प्रतीकों के आदान-प्रदान के साथ आजीवन निभने वाला आत्मीय संबंध स्थापित हो जाता है।
लोककथा और इतिहास में भी मिलता है उल्लेख
लोकमान्यता है कि एक भीषण अकाल के दौरान दो किसानों ने धंवई का फूल देकर मितान बनाया और मिलकर खेती कर अपने परिवारों को संकट से उबारा। भारतीय परंपरा में भगवान राम-सुग्रीव तथा भगवान श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता भी इसी निस्वार्थ और समर्पित भाव की प्रतीक मानी जाती है।
जाति-पांति से ऊपर सामाजिक समरसता का संदेश
छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध कहावत “बने-बने में समधी सियान, अउ बिपत पड़िस त मित-मितान” बताती है कि सुख-दुख में सबसे पहले मितान ही साथ खड़ा होता है। इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जाति, वर्ग और सामाजिक भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। पटेल, साहू, यादव, निषाद, आदिवासी या किसी भी समाज का व्यक्ति मितान बन सकता है। मितान की पत्नी को मितानिन तथा उसके बच्चों को अपने परिवार के सदस्य जैसा सम्मान दिया जाता है। विवाह, जन्म, मृत्यु और हर सामाजिक अवसर पर मितान की उपस्थिति शुभ और आवश्यक मानी जाती है।
लाफिन कला गांव आज भी निभा रहा है परंपरा
महासमुंद जिले के लाफिन कला गांव में आज भी पीढ़ियों पुरानी मितान परंपरा जीवंत है। गांव के शिक्षक महेन्द्र कुमार पटेल बताते हैं कि उनके मितान संतोष निषाद के निधन के बाद उन्होंने उनकी बहन का कन्यादान कर इस रिश्ते की मर्यादा निभाई। यह उदाहरण बताता है कि मितान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदना और जिम्मेदारी का जीवंत रिश्ता है।
हालांकि शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण यह अनमोल लोकपरंपरा धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। फिर भी छत्तीसगढ़ के गांवों में आज भी मितान का रिश्ता यह संदेश देता है कि सच्ची मित्रता उपहारों से नहीं, बल्कि विश्वास, वचन, समर्पण और आजीवन साथ निभाने की भावना से बनती है।
