1.5 करोड़ के एलपीजी घोटाले में शिकंजा और कसा: मुंबई से बुलाए गए चार मददगारों से पूछताछ
फरारी के दौरान आरोपियों को शरण देने वालों पर पुलिस की नजर
महासमुंद। जिले के बहुचर्चित 1.5 करोड़ रुपये मूल्य के एलपीजी गैस गबन मामले में पुलिस की कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है। मामले में फरार रहे ठाकुर पेट्रोकेमिकल के मालिक एवं डायरेक्टर को छिपाने और उनकी मदद करने वालों तक अब जांच की आंच पहुंच गई है। महासमुंद पुलिस ने महाराष्ट्र के मुंबई निवासी चार लोगों को नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया था। चारों गुरुवार को पुलिस के समक्ष उपस्थित हुए, जहां उनसे घंटों पूछताछ की गई।
पुलिस के अनुसार, ठाकुर पेट्रोकेमिकल के मालिक संतोष सिंह ठाकुर और डायरेक्टर सार्थक सिंह ठाकुर की फरारी के दौरान मदद करने वाले जोगेंद्र सिंह, राजू माइकल, राकेश साह और प्रशांत पाटिल को 22 जून 2026 को नोटिस जारी किया गया था। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फरारी के दौरान आरोपियों को किस प्रकार की आर्थिक, तकनीकी और अन्य सहायता उपलब्ध कराई गई।
90 लाख में बेची गई थी जब्त गैस
जांच में सामने आया है कि 24 दिसंबर 2025 को जब्त किए गए छह गैस कैप्सूलों से करीब 92 मीट्रिक टन एलपीजी गैस निकालकर लगभग 90 लाख रुपये में बेच दी गई थी। बाद में पूरे घटनाक्रम को वैध दिखाने के लिए फर्जी पंचनामा और दस्तावेज तैयार किए गए।
पुलिस जांच के मुताबिक, 26 मार्च को तत्कालीन खाद्य अधिकारी अजय यादव और भाजपा नेता पंकज चंद्राकर गैस की मात्रा का आकलन करने सिंघोड़ा थाना पहुंचे थे। वहां छह कैप्सूलों में लगभग 105 मीट्रिक टन गैस होने की जानकारी मिलने के बाद कथित रूप से गैस को खपाने की साजिश रची गई।
आधी रात की बैठक और 80 लाख की डील
जांच में खुलासा हुआ है कि उसी रात गैस एजेंसी संचालकों से संपर्क साधा गया। एक एजेंसी संचालक द्वारा मना करने के बाद रायपुर निवासी मनीष चौधरी के माध्यम से ठाकुर पेट्रोकेमिकल से बातचीत हुई। बताया जाता है कि प्रारंभिक लक्ष्य एक करोड़ रुपये की डील का था, लेकिन अंततः 80 लाख रुपये में सौदा तय हुआ।
पुलिस के अनुसार, इस रकम में सबसे बड़ा हिस्सा तत्कालीन खाद्य अधिकारी अजय यादव को मिला। वहीं शेष राशि विभिन्न स्तरों पर बांटी गई। लेनदेन को सुरक्षित दिखाने के लिए 30 लाख रुपये का डिजिटल ट्रांजेक्शन भी किया गया, जिसे बाद में वापस लौटा दिया गया।
फर्जी पंचनामा बनाकर छिपाने की कोशिश
जांच में यह भी सामने आया है कि गैस निकालने के बाद 6 और 8 अप्रैल को खाली कैप्सूलों का वजन कराया गया। उस दौरान न तो वास्तविक मालिक मौजूद थे और न ही स्वतंत्र गवाह। इसके बावजूद खाद्य विभाग कार्यालय में कथित तौर पर फर्जी पंचनामा तैयार किया गया और उसे आधिकारिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
पुलिस का दावा है कि दस्तावेजों में दर्ज समय और वजन कांटे के रिकॉर्ड में भी गंभीर विसंगतियां मिली हैं, जिससे कूट रचना और फर्जीवाड़े की आशंका और मजबूत हुई है।
पुलिस दबाव बढ़ते ही हुई गोपनीय बैठक
जांच एजेंसियों को यह जानकारी भी मिली है कि कोर्ट से सुपुर्दनामा आदेश और पुलिस की सक्रियता बढ़ने के बाद 20 अप्रैल को आरंग स्थित एक ढाबे में पंकज चंद्राकर, मनीष चौधरी और संतोष ठाकुर के बीच गोपनीय बैठक हुई थी। इस बैठक में कथित रूप से मामले में एक समान बयान देने और जिम्मेदारी से बचने की रणनीति पर चर्चा की गई।
कई आरोपी पहले से जेल में
मामले में तत्कालीन खाद्य अधिकारी अजय यादव, भाजपा नेता पंकज चंद्राकर, मनीष चौधरी, ठाकुर पेट्रोकेमिकल के मैनेजर, संतोष सिंह ठाकुर और सार्थक सिंह ठाकुर पहले से न्यायिक हिरासत में हैं। वहीं आरोपियों की मदद करने वाले एक अन्य व्यक्ति को भी पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है।
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, शासकीय कार्य में अनियमितता, आपराधिक षड्यंत्र समेत विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। अब मुंबई से बुलाए गए चार लोगों से पूछताछ के बाद जांच के दायरे में और नए नाम आने की संभावना जताई जा रही है।
परत-दर-परत खुल रहा घोटाले का राज
करीब डेढ़ करोड़ रुपये मूल्य की एलपीजी गैस के गबन से जुड़े इस मामले में पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे घोटाले की नई परतें सामने आ रही हैं। अब जांच एजेंसियों की नजर उन सभी लोगों पर है जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आरोपियों को संरक्षण देने या साजिश को अंजाम तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
