जब महिलाओं का स्टीयरिंग संभालना था चुनौती, तब सुखिया ने लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी
रायपुर, 20 मई 2026/ रायपुर की सड़कों पर आत्मविश्वास के साथ गाड़ी चलाती महिलाएं आज भले आम नजर आती हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं का स्टीयरिंग संभालना लोगों के लिए आश्चर्य की बात हुआ करता था। ऐसे दौर में एक महिला ने न सिर्फ खुद गाड़ी चलाना सीखा, बल्कि हजारों लोगों को आत्मनिर्भर बनने की राह भी दिखाई। यह कहानी है रायपुर की श्रीमती सुखिया वर्मा की, जिन्होंने संघर्ष, मेहनत और हौसले से अपनी अलग पहचान बनाई।
महतारी गौरव वर्ष के अवसर पर सुखिया जैसी महिलाओं की कहानी समाज को यह संदेश देती है कि अगर परिवार का साथ और आत्मविश्वास हो, तो महिलाएं हर चुनौती को पार कर सकती हैं।
ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी सुखिया की शादी महज 22-23 साल की उम्र में हो गई थी। गांव में रहते हुए वे बैलगाड़ी चलाया करती थीं। उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन यही सफर उन्हें ड्राइविंग स्कूल चलाने तक पहुंचा देगा। शादी के बाद परिवार और खेती-किसानी के कामों के बीच उन्होंने ट्रैक्टर चलाना सीखा। ट्रैक्टर चलाते-चलाते उनके मन में गाड़ी चलाने और दूसरों को सिखाने का विचार आया।
लेकिन यह राह आसान नहीं थी। उस दौर में महिलाओं का वाहन चलाना समाज में सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जाता था। कई बार लोगों की बातें सुननी पड़ती थीं, लेकिन सुखिया ने हार नहीं मानी।
उन्होंने शुरुआती दिनों में अस्पताल की एंबुलेंस भी चलाई। करीब चार वर्षों तक वे अस्पताल की गाड़ियों से मरीजों को लाने-ले जाने का काम करती रहीं। रात के दो बजे भी अगर मरीज को लाने के लिए फोन आता, तो वे बिना डरे निकल पड़ती थीं। लोगों की मदद करना उन्हें अपने काम से और ज्यादा जोड़ता गया।
विद्या ड्राइविंग स्कूल शुरू करने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। तब उन्होंने अपने खेत की जमीन गिरवी रखकर मारुति 800 खरीदी। यही छोटी सी गाड़ी उनके बड़े सपनों का आधार बनी। और उन्होंने सड़कों पर गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनका मानना है कि मैदान वगेरह की जगह सीधे सड़क पर गाड़ी चलाने से डर जल्दी खत्म होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
सुखिया मानती हैं कि महिलाओं के लिए ड्राइविंग आना आत्मनिर्भरता की एक अहम सीढ़ी है, वे महिलाओं को घर से बाहर आकर ड्राइविंग सीखने के लिए प्रोत्साहित भी करती हैं, और यदि कोई महिला ज़रूरतमंद निकली तो उसे बिना ट्रेनिंग की फीस लिए केवल फ्यूल के खर्चे पर भी गाड़ी चलाना सिखाती हैं।
आज सुखिया 4000 से अधिक महिलाओं और पुरुषों को गाड़ी चलाना सिखा चुकी हैं। वे बताती हैं कि जब सीखने वाले लोग बाद में खुश होकर उनसे मिलने आते हैं और बताते हैं कि उन्हें नौकरी मिल गई या अब वे आत्मनिर्भर हो गए हैं, तो उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होती है।
सुखिया के माध्यम से अब तक 500 से अधिक लोगों को रोजगार मिल चुका है। कई महिलाएं और पुरुष आज अलग-अलग जगहों पर ड्राइवर का काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने खुद का वाहन चलाकर अपना रोजगार भी शुरू किया है।
ड्राइविंग स्कूल से हुई कमाई से सुखिया ने अपने परिवार को संभाला। अपनी तीनों बेटियों की शादी की और घर की जिम्मेदारियां निभाईं। वे मानती हैं कि उनकी इस यात्रा में परिवार का सहयोग सबसे बड़ी ताकत रहा। उनके पति, बच्चों और ससुर ने हर कदम पर उनका साथ दिया। यही वजह है कि कठिन परिस्थितियों में भी वे कभी रुकी नहीं।
आज सुखिया की कहानी सिर्फ एक महिला की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो कुछ नया करना चाहती हैं, लेकिन परिस्थितियों या समाज के डर से पीछे हट जाती हैं।
बैलगाड़ी से शुरू हुआ यह सफर आज हजारों लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की मिसाल बन चुका है। महतारी गौरव वर्ष में सुखिया जैसी महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि हौसले और मेहनत के आगे कोई रास्ता मुश्किल नहीं होता।
