गढ़फुलझर नानकसागर में सजा होला मोहल्ला

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने माथा टेककर की अरदास — पर्यटन विकास को मिलेगी नई पहचान
520 वर्ष पूर्व गुरु नानक देव के आगमन से पावन हुई भूमि, 2.50 करोड़ की लागत से पर्यटन स्थल के रूप में हो रहा विकास
महासमुंद। बसना क्षेत्र के ऐतिहासिक और पवित्र स्थल गढ़फुलझर स्थित नानकसागर में आयोजित होला मोहल्ला कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय शामिल हुए। उन्होंने यहां पहुंचकर पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेककर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना की और कीर्तन समागम व अरदास में भाग लिया। इस अवसर पर सिख समाज की ओर से मुख्यमंत्री का सरोपा भेंट कर सम्मान किया गया।
अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि गढ़फुलझर की पावन भूमि अत्यंत पवित्र है, जहां सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक देव जी के चरण पड़े हैं। छत्तीसगढ़ संतों और महापुरुषों की तपोभूमि रही है और ऐसे तीर्थस्थलों का संरक्षण और विकास राज्य सरकार की प्राथमिकता है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि गढ़फुलझर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा पहले ही की जा चुकी है। इसके लिए लगभग 2.50 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई है और विकास कार्य जारी हैं। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि निर्माण कार्यों को शीघ्र पूर्ण किया जाए तथा नानकसागर क्षेत्र में पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
इस अवसर पर कृषि मंत्री रामविचार नेताम, बसना विधायक संपत अग्रवाल, डॉ. भगवान सिंह खोजी, ज्ञानी हरदीप सिंह, दविंदर सिंह, कमलजीत सिंह, नितिनदीप सिंह, कंवलप्रीत सिंह, अमृतपाल सिंह, देवेंद्र सिंह आनंद, रोमी सलूजा सहित सिख समाज के बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। साथ ही छत्तीसगढ़ राज्य बीज निगम के अध्यक्ष चंद्रहास चंद्राकर, येतराम साहू, अखिलेश सोनी, भूपेंद्र सिंह सवन्नी, इंद्रजीत सिंह गोल्डी, अमरजीत छाबड़ा, सरपंच हरप्रीत कौर और अन्य गणमान्य नागरिक भी मौजूद रहे।
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बसना विधायक संपत अग्रवाल ने कहा कि सिख समाज हमेशा संगठित होकर समाज को साथ लेकर चलने वाला समाज है। उन्होंने बताया कि गढ़फुलझर में अमृतसर की तर्ज पर एक भव्य गुरुद्वारा निर्माण प्रस्तावित है, जिससे क्षेत्र की धार्मिक पहचान के साथ पर्यटन को भी नई दिशा मिलेगी।
कार्यक्रम में रिंकू सिंह ओबेरॉय ने बताया कि लगभग 520 वर्ष पूर्व गुरुनानक देव जी अपने प्रथम विश्व भ्रमण के दौरान अमरकंटक और शिवरीनारायण मार्ग से जगन्नाथपुरी जाते समय गढ़फुलझर में दो दिनों तक ठहरे थे। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर तत्कालीन आदिवासी राजा मानस राज सागर चंद भेना ने लगभग 5 एकड़ भूमि गुरु महाराज के नाम समर्पित की थी, जिसे आज भी “गुरुखाप” के नाम से जाना जाता है।
आज गढ़फुलझर न केवल सिख समाज की आस्था का केंद्र है, बल्कि सर्वधर्म समभाव की मिसाल भी है। यहां अभेद किले, प्राचीन सुरंगों, रानी महल के अवशेषों के साथ रनेश्वर रामचंडी मंदिर और बूढ़ादेव मंदिर जैसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं। प्रस्तावित भव्य गुरुधाम के निर्माण से आने वाले समय में यह क्षेत्र एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने की संभावना है।
520 साल पुराना इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1506 में गुरुनानक देव जी अपनी पहली उदासी (विश्व भ्रमण) के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे थे और दो दिनों तक यहां ठहरे थे। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर स्थानीय राजा ने भूमि दान की थी, जो आज भी सिख समाज के लिए आस्था का प्रतीक बनी हुई है।

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