फोर्टिफाइड राइस कर्नेल खरीदी की अनिवार्यता से मिलरों को हो रहा नुकसान: रमेश

महासमुंद। फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (एफआरके) की खरीदी को लेकर लागू नई व्यवस्था ने जिले के राइस मिलरों की चिंता बढ़ा दी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता, पिटियाझर सोसायटी अध्यक्ष एवं राइस मिलर रमेश साहू ने शासन की वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि चुनिंदा अधिकृत फर्मों से ही एफआरके खरीदने की अनिवार्यता के कारण मिलरों की लागत में भारी वृद्धि हो रही है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि शासन के निर्देशानुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए सामान्य चावल में निर्धारित अनुपात में एफआरके मिलाया जाता है। पूर्व में राइस मिलर अपनी सुविधा और प्रतिस्पर्धात्मक दरों के आधार पर खुले बाजार से एफआरके खरीद लेते थे, जिससे लागत संतुलित रहती थी। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में अधिकृत आपूर्तिकर्ताओं से ही खरीदी अनिवार्य कर दी गई है। श्री साहू के अनुसार, बाजार में एफआरके लगभग 40 रुपये प्रति किलो उपलब्ध है, जबकि अधिकृत फर्में इसे 60 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध करा रही हैं। यानी मिलरों को लगभग डेढ़ गुना अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इससे उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ मिलरों की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार द्वारा कुपोषण से निपटने के उद्देश्य से शुरू की गई फोर्टिफाइड चावल योजना जनस्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एफआरके ऐसे विशेष चावल दाने होते हैं, जिनमें आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी-12 जैसे आवश्यक पोषक तत्व सम्मिलित किए जाते हैं। परंतु वर्तमान आपूर्ति व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव और दरों में असमानता के कारण योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित होता दिखाई दे रहा है। श्री साहू ने यह भी आरोप लगाया कि मांग के अनुरूप समय पर एफआरके की आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जिससे मिलिंग कार्य प्रभावित हो रहा है और पीडीएस के तहत समयबद्ध आपूर्ति में बाधाएं आ रही हैं। उन्होंने शासन से मांग की है कि एफआरके का वास्तविक और तार्किक दर निर्धारण किया जाए, आपूर्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए तथा पर्याप्त मात्रा में नियमित उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। इससे जहां योजना का लाभ हितग्राहियों तक सुचारू रूप से पहुंच सकेगा, वहीं राइस मिलरों पर पड़ रहा अतिरिक्त आर्थिक भार भी कम होगा।