कटाई से पहले धान पर कीट-रोगों का हमला, किसानों की बढ़ी चिंता
भूरा माहो, तना छेदक और शीत ब्लास्ट ने बढ़ाई परेशानी; महंगी दवाओं के छिड़काव से खेती की लागत बढ़ी, उत्पादन पर भी संकट
महासमुंद। खेतों में धान की फसल अब पकने की ओर बढ़ रही है, लेकिन कटाई से ठीक पहले भूरा माहो, तना छेदक और शीत ब्लास्ट जैसे कीट-रोगों के प्रकोप ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। फसल बचाने के लिए किसान लगातार कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। इसके बावजूद कई खेतों में कीटों का असर कम नहीं होने से किसानों को उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका सताने लगी है। बार-बार दवा के छिड़काव से खेती की लागत भी बढ़ रही है।
इस वर्ष देर से आए मानसून और लगातार बारिश के कारण खरीफ की खेती करीब एक माह पिछड़ गई। कुछ शुरुआती यानी हरहुना किस्म की फसलें पक चुकी हैं, जबकि मुख्य फसल की कटाई में अभी करीब एक माह का समय बाकी है। ऐसे में फसल के अंतिम चरण में कीट और रोगों का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। खासकर 16 नवंबर से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी शुरू होने की तैयारी के बीच किसान किसी तरह अपनी फसल को सुरक्षित रखने में जुटे हैं।
दो-दो बार छिड़काव के बाद भी नहीं थम रहा प्रकोप
किसानों का कहना है कि शुरुआत में भारी बारिश से फसल प्रभावित हुई और अब जब धान की बालियां निकलने के बाद फसल पकने की ओर है, तब कीटों ने परेशानी बढ़ा दी है। कई खेतों में धान के निचले हिस्से में भूरा माहो दिखाई दे रहा है, जबकि तना छेदक के प्रकोप से पौधों को नुकसान पहुंच रहा है। किसानों के अनुसार वे कीट नियंत्रण के लिए दो से अधिक बार दवा का छिड़काव कर चुके हैं, लेकिन अपेक्षित राहत नहीं मिल रही है। इससे एक ओर दवा का खर्च बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन को लेकर चिंता गहरा गई है।
तना छेदक से सफेद पड़ रही बालियां
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार तना छेदक धान के तने के अंदर पहुंचकर पौधे को नुकसान पहुंचाता है। इसके प्रकोप में बालियां सफेद पड़ने लगती हैं और दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं धान के निचले हिस्से में भूरा माहो का प्रकोप दिखाई देने पर खेत में नमी और पानी की स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है। आवश्यकता के अनुसार कुछ दिनों के लिए खेत से पानी निकालने तथा कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित कीटनाशक का निर्धारित मात्रा में प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
ठंड-ओस से शीत ब्लास्ट का खतरा
मौसम में ठंडक बढ़ने और सुबह की ओस के कारण शीत ब्लास्ट रोग का खतरा भी बढ़ गया है। पत्तियों पर धब्बे दिखाई देने पर समय रहते इसकी पहचान कर अनुशंसित फफूंदनाशक का उपयोग जरूरी बताया गया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बिना रोग की सही पहचान किए बार-बार अलग-अलग दवाओं का छिड़काव करने से किसानों का खर्च बढ़ सकता है और अपेक्षित परिणाम भी नहीं मिलते।
अब खेतों की नियमित निगरानी जरूरी
विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि कटाई तक फसल की नियमित निगरानी करें और कीट या रोग के लक्षण दिखाई देने पर पहले उसकी सही पहचान कराएं। इसके बाद कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही निर्धारित मात्रा में दवा का प्रयोग करें। समय पर बीमारी की पहचान और संतुलित उपचार से फसल को बड़े नुकसान से बचाने के साथ अनावश्यक कीटनाशक खर्च भी कम किया जा सकता है। कटाई से पहले धान की फसल में बढ़ता कीट-रोग प्रकोप किसानों के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है।
