विजयदशमी पर ब्रह्माकुमारी बहनों ने खोला नवरात्रि और दशहरे का आध्यात्मिक राज

सेवाकेंद्र उपकार भवन में आध्यात्मिक ज्ञान के साथ मनाया विजयदशमी पर्व, पांच विकारों पर विजय का लिया संकल्प
महासमुंद। रावण के दस सिर का दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों पर विजय का आध्यात्मिक संदेश है। इसी भाव के साथ प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के तुमगांव रोड स्थित स्थानीय सेवाकेंद्र उपकार भवन में पांच दिवसीय चैतन्य देवियों की मनमोहक झांकी के सफल समापन के बाद ब्रह्माकुमार भाई-बहनों ने आध्यात्मिक ज्ञान एवं चिंतन के साथ विजयदशमी पर्व मनाया।
कार्यक्रम में सेवाकेंद्र संचालिका ब्रह्माकुमारी प्रीति दीदी ने नवरात्रि और विजयदशमी के आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कलियुग के अंतिम चरण में मनुष्य आत्मा जन्म-मरण के चक्र में भटकते-भटकते निर्बल, अशांत और शक्तिहीन हो जाती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों के जाल में फंसकर मनुष्य अपनी वास्तविक शक्ति और स्वरूप को भूल जाता है।
उन्होंने कहा कि पुरुषोत्तम संगमयुग में निराकार ज्योति स्वरूप परमपिता परमात्मा अपने बच्चों को इन विकारों से मुक्त करने के लिए सहज राजयोग की शिक्षा देते हैं। राजयोग के माध्यम से आत्मा को अष्ट शक्तियों का ज्ञान कराया जाता है और उसे अज्ञानता की नींद से जागृत कर अपने वास्तविक चैतन्य ज्योति एवं शक्ति स्वरूप का बोध कराया जाता है।
ब्रह्माकुमारी प्रीति दीदी ने बताया कि आत्मा को विकारों से मुक्त कर संपन्न, संपूर्ण और निर्विकारी बनाने की प्रक्रिया का यादगार ही नवरात्रि पर्व है। वहीं जब मनुष्य इन पांच विकारों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है, तो उसके प्रतीक स्वरूप रावण के दस सिर के दहन का पर्व दशहरा मनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि रावण के दस सिर वास्तव में स्त्री और पुरुष दोनों में विद्यमान पांच-पांच विकारों के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए सच्चा दशहरा तभी सार्थक होगा, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर मौजूद इन पांच बुराइयों पर विजय प्राप्त करने का संकल्प ले।
कार्यक्रम में चैतन्य देवियों की झांकी के माध्यम से दिए गए आध्यात्मिक संदेश को भी स्मरण किया गया। उपस्थित भाई-बहनों ने आत्मिक शक्ति, सद्गुणों और सकारात्मक जीवन मूल्यों को अपनाने तथा विकारों से मुक्त जीवन जीने का संकल्प लिया।

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