तपती सड़कों पर जलती जिंदगी
filter: 0; fileterIntensity: 0.0; filterMask: 0; captureOrientation: 0; brp_mask:0; brp_del_th:null; brp_del_sen:null; delta:null; module: photo;hw-remosaic: false;touch: (-1.0, -1.0);sceneMode: 8;cct_value: 0;AI_Scene: (-1, -1);aec_lux: 0.0;aec_lux_index: 0;albedo: ;confidence: ;motionLevel: -1;weatherinfo: null;temperature: 47;
शहर को साफ रखने वाली बहनों की जलती जिंदगी: 45 डिग्री की धूप में पिघल रहा शरीर, फिर भी कंधों पर ढो रही हैं पूरे शहर का कचरा
जयदेव सिंह
महासमुंद। शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने वाली वे महिलाएं, जिन्हें नगर पालिका ने “सफाई मित्र” का नाम दिया है, आज खुद सबसे ज्यादा उपेक्षा और संवेदनहीनता का शिकार होती नजर आ रही हैं। एक ओर भीषण गर्मी और हीटवेव को देखते हुए शासन द्वारा मवेशियों से काम लेने पर रोक लगाकर मानवीय संवेदनाओं का परिचय दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर 44 से 45 डिग्री तापमान और आसमान से बरसती आग के बीच नगर पालिका के मिशन क्लीन सिटी में कार्यरत सफाई मित्र बहनें रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर शहर की सफाई व्यवस्था संभालने को मजबूर हैं।
तपती सड़कों पर दिनभर रिक्शा खींचती ये महिलाएं अब सवाल पूछ रही हैं कि क्या संवेदनाएं सिर्फ पशुओं के लिए हैं? क्या शहर को साफ रखने वाली इन मेहनतकश महिलाओं की जिंदगी और स्वास्थ्य की कोई कीमत नहीं?
नगर पालिका में कार्यरत लगभग 117 सफाई मित्र बहनें सप्ताह में 6 दिन लगातार लगभग 10 घंटे तक काम करती हैं। सुबह साढ़े 6 बजे वे नगर पालिका कार्यालय पहुंचती हैं, जहां निष्ठा ऐप में हाजिरी दर्ज कराने के बाद अपने-अपने वार्डों के लिए निकल पड़ती हैं। इसके बाद शुरू होता है संघर्ष का वह सफर, जो तेज धूप, गर्म हवाओं और थकान से भरे लंबे घंटों तक चलता रहता है।
शहर के 30 वार्डों में घर-घर जाकर कचरा संग्रहण करना, भारी रिक्शा चलाना, संकरी गलियों से गुजरना और फिर शहर से दूर स्थित मणिकंचन केंद्रों तक कचरा पहुंचाना इनके रोजमर्रा के काम का हिस्सा है। लेकिन यह काम जितना सुनने में सामान्य लगता है, हकीकत में उतना ही कठिन और पीड़ादायक है।
दोपहर होते-होते सड़कें आग उगलने लगती हैं। गर्म हवाएं चेहरे को झुलसाने लगती हैं। कई बार रिक्शा धकेलते-धकेलते महिलाओं के हाथ कांपने लगते हैं, शरीर जवाब देने लगता है और आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है। इसके बावजूद मजबूरी ऐसी है कि वे रुक नहीं सकतीं। क्योंकि यदि काम रुका, तो घर की रसोई भी ठंडी पड़ जाएगी।
सफाई मित्र दोसदा चंद्राकर बताती हैं कि दोपहर की गर्मी में रिक्शा चलाना किसी सजा से कम नहीं लगता। कई बार ऐसा महसूस होता है जैसे शरीर जल रहा हो, लेकिन जिम्मेदारी निभाने के लिए काम करना ही पड़ता है। वहीं सुमति कसना कहती हैं कि कई महिलाओं को चक्कर आने लगते हैं, ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, बुखार और कमजोरी हो जाती है, लेकिन छुट्टी लेने का मतलब वेतन कटना है।
प्रभा चंद्राकर, रीना छात्रे, तोरण चक्रधारी, ज्योति यादव और अलका चंद्राकर जैसी कई महिलाओं का कहना है कि यदि कार्य का समय सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे के बजाय सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक कर दिया जाए, तो उन्हें भीषण गर्मी से काफी राहत मिल सकती है। उनका कहना है कि दोपहर की धूप सबसे ज्यादा जानलेवा साबित हो रही है। लेकिन बार-बार मांग उठाने के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
नगर पालिका द्वारा सफाई कार्य के लिए 21 फुट रिक्शा और 20 ई-रिक्शा उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन कई वार्डों में अब भी महिलाओं को भारी रिक्शा खुद चलाकर कचरा ढोना पड़ता है। हालत यह है कि शहर से लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थित खरोरा, खैरा, तुमाडबरी और दलदली रोड के मणिकंचन केंद्रों तक कचरा पहुंचाने के बाद भी इन महिलाओं का काम खत्म नहीं होता। वहां पहुंचकर उन्हें गीले और सूखे कचरे की छंटनी भी करनी पड़ती है।
सबसे ज्यादा दर्दनाक स्थिति तब सामने आती है, जब इन रिक्शों की मरम्मत का खर्च भी इन्हीं महिलाओं को अपनी जेब से उठाना पड़ता है। महज 8 हजार रुपए मासिक वेतन पाने वाली सफाई मित्र बहनों को यदि रिक्शा में कोई बड़ी खराबी आ जाए, तो 1 से 2 हजार रुपए तक खुद खर्च करने पड़ते हैं। यानी एक ओर कम वेतन, दूसरी ओर तपती गर्मी में कठिन श्रम और ऊपर से काम के संसाधनों का खर्च भी इन्हीं के सिर पर।
इन महिलाओं की जिंदगी संघर्ष का ऐसा चेहरा बन चुकी है, जिसे शहर हर रोज देखता तो है, लेकिन शायद महसूस नहीं करता। सुबह जब लोग अपने घरों से कचरे की बाल्टी बाहर रखते हैं, तब शायद ही किसी को अंदाजा होता होगा कि उस कचरे को उठाने वाली महिला किन परिस्थितियों में काम कर रही है। जिस शहर की स्वच्छता के लिए वे अपना पसीना बहा रही हैं, उसी व्यवस्था में उनके हिस्से राहत, सम्मान और सुरक्षा अब भी अधूरी है।
इधर, इस मामले में जिले के कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने कहा कि, “नगर पालिका का अपना अलग सिस्टम है। आपके माध्यम से हमें जानकारी मिली है। निश्चित रूप से सफाई मित्र बहनों को राहत देने के लिए कार्य समय में बदलाव पर विचार करेंगे और इस तपती गर्मी में उन्हें राहत पहुंचाने की पूरी कोशिश की जाएगी।”
कलेक्टर के इस आश्वासन के बाद अब सफाई मित्र बहनों को उम्मीद है कि शायद इस बार उनकी पीड़ा सिर्फ खबर बनकर नहीं रह जाएगी, बल्कि उन्हें भीषण गर्मी से राहत देने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा।
फिलहाल, तपती दोपहर में शहर की सड़कों पर रिक्शा चलाती ये महिलाएं सिर्फ कचरा नहीं ढो रहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का बोझ भी अपने कंधों पर उठा रही हैं।
