शिक्षकों को कठपुतली बनाने हुई कार्यशाला
महासमुंद। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) महासमुंद में शिक्षकों के लिए आयोजित कठपुतली निर्माण कार्यशाला सम्पन्न हुई। कार्यशाला का उद्देश्य शिक्षकों को कला-आधारित शिक्षण पद्धति से जोड़ते हुए कक्षा शिक्षण को अधिक रोचक, प्रभावी और सहभागितापूर्ण बनाना था, ताकि बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को आनंददायक बनाया जा सके।
कार्यशाला के दौरान जिला स्तरीय डीआरजी टीम के सदस्य बलराम नेताम, के.आर. सोनवानी एवं नीलकंठ यादव ने कठपुतली निर्माण की विभिन्न विधियों का व्यवहारिक प्रदर्शन किया। प्रशिक्षार्थियों को स्थानीय एवं सरल सामग्रियों से कठपुतली बनाने की तकनीक सिखाई गई और बताया गया कि कठपुतली के माध्यम से भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों को कहानी व संवाद के रूप में बच्चों तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है। प्रशिक्षण प्रभारी व्याख्याता संतोष साहू ने कहा कि कठपुतली कला बच्चों की कल्पनाशक्ति, अभिव्यक्ति क्षमता और आत्मविश्वास को विकसित करने का प्रभावी माध्यम है। जब शिक्षक कक्षा में इसका उपयोग करते हैं तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में अधिक रुचि लेते हैं। डाइट के प्राचार्य अरुण प्रधान ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में कहा कि नई शिक्षा नीति अनुभव आधारित, कला आधारित और बालक-केंद्रित शिक्षा पर बल देती है। कठपुतली कला शिक्षण को जीवन से जोड़ने और बच्चों में रचनात्मकता, समस्या समाधान क्षमता तथा संचार कौशल विकसित करने का प्रभावी माध्यम है।इस अवसर पर किरण कन्नौजे ने कहा कि कठपुतली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने वाला महत्वपूर्ण टीचिंग-लर्निंग मैटेरियल (टीएलएम) है, जिसके माध्यम से स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता और सामाजिक मूल्यों जैसे विषयों पर भी बच्चों को जागरूक किया जा सकता है। कार्यशाला में प्रतिभागियों को छड़ी कठपुतली , हाथ कठपुतली, छाया कठपुतली और डोर कठपुतली जैसे विभिन्न प्रकारों से परिचित कराया गया। शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए कठपुतली निर्माण की प्रक्रिया स्वयं करके सीखी और कक्षा शिक्षण में इसके उपयोग पर चर्चा की। कार्यक्रम को सफल बनाने में डाइट के प्राचार्य अरुण प्रधान, उप प्राचार्य उमा देवी शर्मा, के. सिंह, किरण कन्नौजे, दुर्गा सिन्हा, शोभा द्विवेदी और ईश्वर चन्द्राकर का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं सहयोग रहा।
