युवाओं की टोली विलुप्त हो रहे गौरैया के संरक्षित करने चला रहे अभियान
गांवों में मिट्टी का बसेरा लगा कर पक्षियों को दे रहे हैं आशियाना
महासमुंद। छत्तीसगढ़ में कटते जंगल, उजड़ते वन और बढ़ती आबादी ने पक्षियों का आशियाना लगभग छीन सा लिया है। इनमें पक्षियों की कुछ ऐसी प्रजातियां हैं, जो विलुप्ति की कगार पर हैं। इन्ही पक्षियों में एक प्रजाति है, गौरैया। ये कभी हमारे घरों के आंगन में फुदकती और चहकती थी, लेकिन आज ये कम ही नजर आती है। इसे संरक्षित करने महासमुंद वन विभाग तो समय समय पर अभियान चलाता ही है, लेकिन जब कोई समिति बनाकर युवा बिना किसी सरकारी मदद के इस काम का बीड़ा उठा ले तो क्या कहने। जी हां एक ऐसा ही गांव है महासमुंद जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बागबाहरा ब्लाॅक के आमाकोनी जहां गौरैया को बचाने पिछले 9 सालों से युवाओं ने एक मुहिम छेड़ रखी है।
पक्षियों के संरक्षण और उनके प्रति लगाव की बातें हम अक्सर सुनते और पढ़ते हैं, लेकिन हम खुद इस दिशा में क्या करते हैं, ये सोचने का विषय है। लेकिन हमारे बीच ऐसे लोग भी मौजू्द हैं, जो इन पक्षियों को संरक्षित करने का काम खुद अपने बल पर कर रहे हैं। ऐसे ही एक समिति है जिसका नाम है दो क़दम प्रकृति की ओर। जिसका संचालन जो पेशे से फार्मासिस्ट हैं संजय साहू द्वारा किया जा रहा है, लेकिन सही मायने में हमारे आंगन की गौरैया को संरक्षित करने का काम और पक्षियों के लिए इनका लगाव देखते ही बनता है। दरअसल ये अपने काम के साथ गौरैया के लिए बसेरा (घोसला) बनवाते हैं, और साथ ही इन पक्षियों को संरक्षित करने का काम कर रहे हैं। यही नहीं संजय साहू बसेरा बना कर निशुल्क बांटते भी हैं। इनके बनाए घोसले में गौरैया आसानी से देखी जा सकती है।
दो कदम प्रगति की ओर समिति में 25 सदस्य टीम मिलकर पिछले 9 सालों से बिलुप्त हो रहे गौरैया के संरक्षण का काम कर रही हैं। इसके पीछे की बजह है कि लोगों का रहन सहन और बदलते परिवेश के कारण गौरैया मानव जीवन से दूर और बिलुप्त के कगार पर है। लोगों का जीवन स्तर में बदलाव और मिट्टी के घरों से दूरी और कांक्रीट के बने पक्के मकान बनने लगे हैं। इस समिति के युवाओं ने ना सिर्फ गौरैया बल्कि जंगली गौरैया, मैना, रोविन, सिल्वर बिल, मुनिया, बसंता जैसी पक्षियों का संरक्षण करने में जुटे हैं। इस समिति के युवाओं की सोच है कि मानव और गौरैया के बीच बढ़ती दूरी को कम करना है। साथ ही यह भी मानना है कि फसलों में कीटनाशक दवा का छिड़काव भी गौरैया के बिलुप्ति का कारण बनता जा रहा हैं।
संजय की टीम गौरैया के संरक्षण बागबाहरा ब्लाॅक के बहुत से गांव समेत गरियाबंद, छुरा, राजिम जागरूकता अभियान चला कर गांव में मिट्टी का बसेरा लगाने का काम कर रहे हैं।
संजय साहू के बनाए गए बसेरा की खासियत यही है कि ये मिट्टी के बनाते हैं। जिसको गौरैया सहज ही अपने आशियाने के रूप में स्वीकार कर लेती है, और रहने लगती है। इनके इस प्रयास से ये अंदाजा आपको भी लग जाएगा, कि हमारे आंगन की गौरैया एक बार फिर हमारे आंगन में चहकेगी। और इसके लिए छत्तीसगढ़ के अलावा केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड, चंडीगढ़ जैसे राज्य से लोग सोशल मीडिया के जरिए बसेरा मंगवा रहे हैं, और संजय कुरियर के माध्यम से भेज भी रहे हैं। वहीं वन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि गौरैया एक संवेदनशील पक्षी है, अगर इन पक्षियों के संरक्षण की दिशा पर कोई काम कर रहे हैं तो उल्लेखनीय काम कर रहे हैं।
आपको बता दें कि, महासमुंद वन विभाग नें भी गौरैया के संरक्षण के लिए 4 साल पहले जोर-शोर से अभियान चलाया था, और जिले भर में बसेरा (घोसला) बनाने अनेक कार्यशाला आयोजित कर बनाना सिखाया था। लेकिन सरकारी अभियान बंद है।
