विशेष लेख : विकास की नई कहानी लिख रहा बस्तर
– नसीम अहमद खान
उप संचालक, जनसंपर्क
रायपुर , 23 मई 2026/कभी गोलियों की आवाज, बारूद विस्फोट और खौफ के साये से पहचाना जाने वाला बस्तर अब तेजी से बदल रहा है। जिन गांवों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता था, वहां अब बच्चों की पढ़ाई की आवाज सुनाई दे रही है। जिन रास्तों पर कभी सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ों की खबरें आती थीं, वहां अब सड़कें बन रही हैं, बिजली पहुंच रही है और विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। बस्तर की यह बदलती तस्वीर केवल सरकारी दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के जनजीवन में साफ महसूस की जा सकती है।
यह बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में चल रही सुरक्षा और विकास की दोहरी रणनीति का असर है। राज्य सरकार का फोकस अब केवल बस्तर के लोगों का भरोसा जीतना और बस्तर को शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और बुनियादी सुविधाओं से जोड़कर मुख्यधारा में लाने पर है।
अबूझमाड़ के रेकावया गांव में आजादी के बाद पहली बार स्कूल बन रहा है। यह सिर्फ एक भवन निर्माण नहीं, बल्कि उस उम्मीद का प्रतीक है जिसका इंतजार वर्षों से किया जा रहा था। नारायणपुर के दूरस्थ इलाकों में 50 से अधिक ऐसे स्कूल दोबारा खोले गए हैं, जहां कभी नक्सलियों के डर से ताले लटक गए थे। अब बच्चे बिना भय के पढ़ाई कर रहे हैं। बस्तर का चर्चित गांव पुवर्ती, जिसे कभी नक्सली गतिविधियों का मजबूत केंद्र माना जाता था, आज सड़क और बिजली से जुड़ चुका है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि अब विकास जंगलों और पहाड़ियों को पार करते हुए अंतिम छोर तक पहुंच रहा है।
नक्सल प्रभावित इलाकों में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने ‘नियद नेल्ला नार’ योजना शुरू की। इसके तहत 521 गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाओं का विस्तार किया गया। एक लाख से ज्यादा लोगों के आधार कार्ड बनाए गए, लगभग 60 हजार लोगों को आयुष्मान कार्ड मिले और बड़ी संख्या में राशन कार्ड तथा मनरेगा जॉब कार्ड वितरित किए गए। इन क्षेत्रों में 43 नई सड़कें बनाई गई हैं। मोबाइल नेटवर्क को मजबूत करने के लिए लगातार नए टावर लगाए जा रहे हैं। महिलाओं को महतारी वंदन योजना के तहत सीधे खातों में राशि मिलने से आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है।
पिछले ढाई वर्षों में नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता मिली है। सुरक्षाबलों ने 500 से अधिक नक्सलियों को निष्प्रभावी किया है। वहीं नई पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर 2800 से ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जबकि 2037 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है। स्थानीय लोगों में सुरक्षा का भरोसा बढ़ाने के लिए 86 नए सुरक्षा कैंप खोले गए हैं। इन कैंपों की वजह से प्रशासन अब उन इलाकों तक पहुंच पा रहा है, जहां कभी जाना बेहद कठिन माना जाता था।
बीजापुर जिले का चिल्कापल्ली गांव बदलाव की नई मिसाल बन गया है। यहां आजादी के 77 साल बाद 26 जनवरी 2025 को पहली बार बिजली पहुंची। इसके बाद तेमेनार, पुसकोंटा और हांदावाड़ा जैसे गांवों में भी रोशनी पहुंची। जिन गांवों में कभी अंधेरा और डर एक साथ मौजूद थे, वहां अब सामान्य जीवन लौटता दिखाई दे रहा है।
राज्य सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में पुनर्वास को अहम हथियार बनाया है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को तीन साल तक हर महीने 10 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। उन्हें जमीन, मकान और रोजगार के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। इनामी नक्सलियों को घोषित इनाम की राशि भी दी जा रही है। इतना ही नहीं, अगर किसी संगठन के 80 प्रतिशत सदस्य एक साथ आत्मसमर्पण करते हैं, तो उन्हें अतिरिक्त लाभ भी मिलता है। नक्सल मुक्त गांवों में एक करोड़ रुपये तक के विकास कार्य कराए जा रहे हैं।
बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर यह है कि अब लोग लोकतंत्र पर भरोसा जता रहे हैं। फरवरी और मार्च 2026 में 368 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ विधानसभा का भ्रमण कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझा। यह इस बात का संकेत है कि हिंसा छोड़कर लोग संवाद और लोकतंत्र के रास्ते को अपना रहे हैं। बस्तर में सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी तेजी से सामान्य हो रहा है। बस्तर ओलंपिक में इस बार 3.91 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के युवा, दिव्यांग और आत्मसमर्पित लोग भी शामिल रहे।
बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने आदिवासी संस्कृति को नई पहचान दी है। वर्ष 2025 में 47 हजार कलाकार जुड़े थे, जबकि 2026 में इसे और बड़े स्तर पर 12 विधाओं में आयोजित किया गया। इससे बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई है।
बस्तर में बुनियादी ढांचे के विकास को भी गति मिली है। वर्षों से अधूरी पड़ी 41 सड़कें पूरी की जा चुकी हैं। ताड़मेटला और कटेकल्याण-कापानार-नडेनार जैसी सड़कें अब तैयार हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 2500 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण प्रस्तावित है। 146 सड़क और पुल निर्माण कार्यों के लिए 1109 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में कई महत्वपूर्ण सड़क और पुल निर्माण कार्य पूरे हुए हैं। रेल कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन को मंजूरी दी गई है। 140 किलोमीटर लंबी इस परियोजना पर 3513 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा कोत्तवलसा-किरंदुल रेल लाइन के दोहरीकरण का काम भी तेजी से चल रहा है।
सिंचाई क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर मटनार और देऊरगांव में 2024 करोड़ रुपये की लागत से बैराज और 68 किलोमीटर लंबी नहर निर्माण की योजना है। इससे लगभग 32 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। कांकेर का मेढकी बैराज, बीजापुर की मट्टीमारका डायवर्सन योजना और बस्तर का महादेवघाट बैराज भी स्वीकृत हो चुके हैं।
अब बस्तर की पहचान सिर्फ नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में नहीं रह गई है। चित्रकोट जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान और धुड़मारास गांव जैसे स्थान देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। होमस्टे और इको-टूरिज्म के जरिए स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है। युवाओं को अब गांव छोड़ने की जरूरत कम पड़ रही है। सरकार अब अबूझमाड़ और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने की तैयारी कर रही है। साथ ही एग्रो-प्रोसेसिंग और वन आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर स्थानीय रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
आज बस्तर का युवा बंदूक नहीं, बल्कि शिक्षा, खेल और रोजगार को अपना भविष्य मान रहा है। महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं, किसान नई खेती की ओर बढ़ रहे हैं और गांवों में उम्मीद की नई रोशनी दिखाई दे रही है। बदलते बस्तर की यह तस्वीर साफ संकेत देती है कि नक्सलवाद अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है।
